डलहौजी दूसरा दिन
डैणकुंड
यह दिन हमारा कुछ हेक्टिक होने वाला था। हम सुबह आराम से तैयार होकर निकले ।हमें खजियार की तरफ जाना था ।पर उससे पहले हमें डैणकुंड के बारे में बताया गया ।यह एरिया पूरी तरह आर्मी के पास है ।हमने अपनी गाड़ी नीचे ही लगाई । फिर एक मंदिर के रास्ते की तरफ निकले ।यह एक तरह की ट्रैकिंग थी और धूप पूरी तरह खिली हुई थी । थूप ठंडे मौसम में बहुत ही लुभावनी लग रही थी ।ऊपर देखते हुए बहुत ही अच्छा लग रहा था ।हम धीरे-धीरे मंदिर की तरफ बढ़ने लगे । यहां से मंदिर का कोई नामोनिशान दिखाई नहीं दे रहा था। बहुत दूर एक बैठने की जगह दिखाई देती है ।जहां तक जाने की कुछ ही लोग हिम्मत करते हैं ।जबकि वह कोई ज्यादा दूर नहीं है ।जो वहां तक पहुंच गया ,90% वह मंदिर की ओर बढ़ ही जाता है । क्योंकि ,वहां से मंदिर का रास्ता सीधा सीधा ही जाता है ।उसमें कुछ चढ़ाई जैसा नहीं है। रास्ते में बहुत ही मनभावन दृश्य है । इस मौसम में भी कहीं आपको बर्फ दिख सकती है। पहाड़ फूलों से लदे (फ्लावर बैड )देख सकते हैं ।दूर तक एक सारम छोटी-छोटी फूलों से ढका हुआ पर्वत। यहां से दूर बर्फ की पहाड़ियां दिखाई देती हैं ।एक तरफ शिवालिक की पहाड़ियां और दूसरी तरफ धौलाधार पर्वत माला ।पहाड़ों के बीच यह सफर बहुत ही मनभावन प्रतीत होता है।
मंदिर तक पहुंच कर मंजिल को पा जाने जैसा एहसास होता है। ट्रैकिंग करने वाले लोग इस से भी आगे निकल जाते हैं ।हम तो वहीं काली माता और शिवलिंग को माथा टेक कर वापस निकल पड़े ।पर वहां जाकर बहुत तसल्ली से मिल रही थी ।साफ सांस लेते हुए अपने शरीर के लिए कुछ अच्छा करने जैसा प्रतीत हो रहा था। एक दम शांत वातावरण ,स्वच्छ हवा ,साफ पानी बस जैसे कुदरत कुदरत से मिल रही हो ।ऐसा ही शरीर को वहां पर एहसास हो रहा था। इसके बाद हम नीचे चले आए और अपना सफर खजियार के लिए शुरू किया।
खजियार
जैसे ही हम खजियार पहुंचे ।
हमने पैराग्लाइडिंग का मन पहले ही बना रखा था और वहां पार्किंग से पहले ही हमें पैराग्लाइडिंग करवाने वाले से मुलाकात हो गई ।और वह सीधा हमें कालाटोप की तरफ ले गया। हमने भी सोचा पहले पैराग्लाइडिंग कर ली जाए, फिर आराम से खजियार में घूमेंगे।
पैराग्लाइडिंग के चक्कर में एक और ट्रेकिंग हो गई ।जो सपाट सीधी ऊपर तक हमें पैदल लेकर गए ।आधे घंटे का ट्रैक सीधा सपाट ऊपर को जाता हुआ, जबकि हमारा पायलट 10 मिनट 10 मिनट कहकर हमें उपर ले गया ।उसके बाद ग्लाइडर में पूरा ऊपर से नजारा देखते हुए नीचे पहुंचे।ग्लाइडिंग करते हुए तो दिल चाह रहा था कि यह सफर कभी भी ख़त्म ना हो और हम यूं ही पंछी बन उड़ते रहे।
यहाँ एक मंदिर के दर्शन किए ,इसके बाद हम खज्जियार वापस आ कुछ खाने पीने बैठ गए और वहां आए टूरिस्टों को, बच्चों को गोलों में खेलते हुए और घोड़ों की ग्रुप सवारी करते हुए देखने लगे ।कुछ देर के नजारे के बाद हम लोगों ने वापस चलने की सोचा और फिर वापस होटल की तरफ अपनी गाड़ी दौड़ा दी।
शाम को गाड़ी खड़ी करके फिर हम माल रोड की तरफ निकल पड़े ।खाने पीने के बाद तिब्बती मार्केट में कुछ शॉपिंग की और कल के सफर के लिए तैयार होने और आराम करने को होटल पहुंच गए।
























